: सरोकार:-- 19 दिसंबर हमारे राष्ट्र के लिए इतना अहम क्यों आइए जाने
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Mon, Dec 19, 2022
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सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजूए कातिल में है । 19 दिसम्बर 1927 को बिस्मिल रोज की भाँति सवेरे उठकर शौचादि के बाद दाढी बना रहे थे । उसी समय बाबा राघवदास उनसे अन्तिम मुलाकात करने आए थे । उन्हें दाढी बनाता देखकर बोले--" बिस्मिल ! आज तुम्हारी फांसी है और तुम हजामत बना रहे हो । इस पर बिस्मिल हंसकर बोले-- " जब कोई यात्रा पर जाता है तो बन संवर कर जाता है और मैं तो महायात्रा पर जा रहा हूँ ।" फांसी के लिए ले जाते समय बिस्मिल ने वन्देमातरम और भारत माता की जय का जोर से जयकारा लगाते हुए कहा-- " देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएँगे । मरते-मरते देश को जिन्दा, मगर कर जाएँगे । डरता मौत से क्या है, अमर है आत्मा मेरी । नहीं कुछ कारगर होने की, उस पर तेग यह तेरी ।। भारत माँ के अमर सपूत रामप्रसाद बिस्मिल जी पुन्य: तिथि पर उन्हें कोटिशः नमन करते हुए श्रधा सुमन भेंट करते हैं
19 दिसंबर 1927 भारतीय इतिहास में एक बहुत ही अहम तारीख है। इस दिन भारतीय आवाम ने अपने तीन वीर सपूत खोये। फैजाबाद में अशफाक उल्ला, गोरखपुर में रामप्रसाद बिस्मिल और नैनी जेल में रोशन सिंह ने आजाद भारत का सपना लिए हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। नौ अगस्त 1925 को काकोरी में आजादी के इन दीवानों ने भारतीयों की खून पसीने की कमाई को लूट कर ले जा रही अंग्रेजों की ट्रेन को रोक उस धन पर अपना अधिकार कर लिया और उस धन का प्रयोग भारत को आजाद कराने की योजनाओं को पूरा करने के लिए किया। अशफाक काकोरी एक्शन के क्रांतिकारियों में सबसे छोटे थे। वह किशोरावस्था में हसरत के उपनाम से शायरी किया करते थे। घर में जब भी शायरी की बात चलती थी, तो उनके बड़े भाई रामप्रसाद बिस्मिल का जिक्र किया करते थे। इन्ही किस्सों के चलते अशफाक बिस्मिल के दीवाने हो गये। इसी वक्त बिस्मिल का नाम मैनपुरी कांड में आना शुरू हो गया। इससे अशफाक बिस्मिल से मिलने के लिए बेचैन होने लगे और उन्होंने ठान लिया कि बिस्मिल से मुझे मिलना ही है। आखिरकार उनकी दोस्ती बड़े भाई के जरिये बिस्मिल से हो ही गयी। उसी समय शाहजहांपुर की एक मीटिग में भाषण देने बिस्मिल को आना था। कार्यक्रम खत्म हुआ तो अशफाक बिस्मिल के पास गए और अपना परिचय दिया कि मैं वारसी और हसरत के नाम से शायरी करता हूं। बिस्मिल की थोड़ी रुचि बढ़ी और उनके कुछ शेर सुने, जो उनको पसंद आये। इसी के बाद दोनों अक्सर साथ दिखने लगे और एक साथ आने जाने लगे। काकोरी एक्शन के हीरो अशफाक ने दोस्ती की जो मिसाल कायम की वह आज भी बेमिसाल है। भारतीय एकता व अखंडता में दूसरी कोई ऐसा उदाहारण नहीं है। भारत की आजादी की लड़ाई में हिदू-मुस्लिम एकता का इससे अच्छा प्रतिमान नहीं है।
19 दिसंबर 1927 भारतीय इतिहास में एक बहुत ही अहम तारीख है। इस दिन भारतीय आवाम ने अपने तीन वीर सपूत खोये। फैजाबाद में अशफाक उल्ला, गोरखपुर में रामप्रसाद बिस्मिल और नैनी जेल में रोशन सिंह ने आजाद भारत का सपना लिए हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। नौ अगस्त 1925 को काकोरी में आजादी के इन दीवानों ने भारतीयों की खून पसीने की कमाई को लूट कर ले जा रही अंग्रेजों की ट्रेन को रोक उस धन पर अपना अधिकार कर लिया और उस धन का प्रयोग भारत को आजाद कराने की योजनाओं को पूरा करने के लिए किया। अशफाक काकोरी एक्शन के क्रांतिकारियों में सबसे छोटे थे। वह किशोरावस्था में हसरत के उपनाम से शायरी किया करते थे। घर में जब भी शायरी की बात चलती थी, तो उनके बड़े भाई रामप्रसाद बिस्मिल का जिक्र किया करते थे। इन्ही किस्सों के चलते अशफाक बिस्मिल के दीवाने हो गये। इसी वक्त बिस्मिल का नाम मैनपुरी कांड में आना शुरू हो गया। इससे अशफाक बिस्मिल से मिलने के लिए बेचैन होने लगे और उन्होंने ठान लिया कि बिस्मिल से मुझे मिलना ही है। आखिरकार उनकी दोस्ती बड़े भाई के जरिये बिस्मिल से हो ही गयी। उसी समय शाहजहांपुर की एक मीटिग में भाषण देने बिस्मिल को आना था। कार्यक्रम खत्म हुआ तो अशफाक बिस्मिल के पास गए और अपना परिचय दिया कि मैं वारसी और हसरत के नाम से शायरी करता हूं। बिस्मिल की थोड़ी रुचि बढ़ी और उनके कुछ शेर सुने, जो उनको पसंद आये। इसी के बाद दोनों अक्सर साथ दिखने लगे और एक साथ आने जाने लगे। काकोरी एक्शन के हीरो अशफाक ने दोस्ती की जो मिसाल कायम की वह आज भी बेमिसाल है। भारतीय एकता व अखंडता में दूसरी कोई ऐसा उदाहारण नहीं है। भारत की आजादी की लड़ाई में हिदू-मुस्लिम एकता का इससे अच्छा प्रतिमान नहीं है।
भारत को आजादी दिलाने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह को 1927 में 19 दिसंबर के दिन ही फांसी दी गई थी। इस दिन को शहादत दिवस के रूप में मनाया जाता है। आजादी के इन मतवालों को काकोरी कांड को अंजाम देने के लिए फांसी दी गई थी। 19 तारीख को हमारे देश के इतिहास में एक और बड़ी घटना दर्ज है। 1961 में 19 दिसंबर के दिन ही भारतीय सेना ने गोवा को 450 साल के पुर्तगाली शासन से आजाद कराया था। ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत भारतीय सैनिकों ने गोवा में प्रवेश किया था। इस ऑपरेशन की शुरूआत 18 दिसंबर, 1961 को की गई थी और 19 दिसंबर को पुर्तगाली सेना ने आत्मसमर्पण किया था।
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