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: अब चीन की निगाहें भारत के गोरखा रेजीमेंट पर चीन दबाव बना रहा है गोरखा की भर्ती के लिए नेपाल सरकार पर

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Thu, May 4, 2023
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चीन नेपाली गोरखाओं को अपनी आर्मी पीएलए में शामिल करने के लिए काफी रुचि दिखा रहा है वहीं साल 2023 में भी एक भी नेपाली गोरखा भारतीय सेना में शामिल नहीं हो पाएगा. नेपाल की कम्यूनिस्ट सरकार ने भारतीय सेना में शामिल होने के लिए गोरखाओं को अनुमति नही दी है. हर साल भारतीय सेना में 1300 गोरखा भर्ती होते हैं. नेपाल सरकार की परमिशन ना देने की वजह अग्निपथ स्कीम है. नेपाल को भारत की इस योजना से आपत्ति है. उसका कहना है कि इस योजना 1947 में हुए त्रिपक्षीय समझौते का उल्लघंन है इस समझौते के तहत ही नेपाली गोरखाओं को भारत और ब्रिटेन की सेना ज्वाइन करने की मंजूरी मिली हुई है. ऐसे में अगर नेपाली गोरखा चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी(पीएलए) में जाते हैं तो चीन भारत और ब्रिटेन के बाद ऐसा तीसरा देश बन जाएगा जिसकी सेना में नेपैली गोरखा होंगे. गोरखाओं को काफी निडर सैनिक माना जाता है. अगर ऐसा होता है तो भारत-नेपाल के संबंधों पर भी इसका असर नजर आएगा, जिनमें पिछले कुछ सालों में वैसी गर्मजोशी नहीं नजर आ रही है, जिसक लिए दोनों देश जाने जाते थे. चीन नेपाल सरकार से कर सकता है गोरखाओं की डिमांड दरअसल चीन भारतीय सेना में भर्ती गोरखा सैनिकों को लेकर चितिंत है. नेपाल के युवाओं की भारतीय सेना में शामिल होने का काफी दिलचस्पी है. इसी वजह से चीन, नेपाल में शासन कर रही कम्यूनिस्ट सरकार से गोरखाओं को उसकी आर्मी ( पीएलए) में भर्ती होने की परमिशन देने की मांग कर सकता है. दरअसल चीन ऐसा करके हिमालयी राष्ट्र में भारत विरोधी भावना पैदा करना चाहता है. साल 1815 के बाद से पहले भारतीय सेना और फिर ब्रिटिश सेना में भर्ती में हुए हैं. अंग्रेजों ने गोरखा रेजीमेंट्स का गठन किया था, जो विभिन्न सैन्य अभियानों में बहादुरी से लड़े थे भारत और ब्रिटेन की सेना में हैं नेपाली गोरखा   आजादी के बाद भारत ने गोरखा सैनिकों की 6 रेजीमेंट को बरकरार रखा. जबकि चार ब्रिटेन के पास चली गई. भारत-नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए एक त्रिपक्षीय समझौते के तहत ये बंटवारा हुआ. फिलहाल भारत में सात गोरखा रेजीमेंट हैं और इन रेजीमेंट मे 39 बटालियन है. इनमें 32 हजार से ज्यादा गोरखा जवान तैनात है. इनमें से एक चौथाई नेपाली मूल के हैं गोरखाओं को दुर्गभ भौगोलिक परिस्थितियों में लड़ने में महारत हासिल है. इसलिए इन्हें भारतीय सेना की रीढ़ माना जाता है. गौर करने वाली बात है कि साल 1962 के युद्ध के बाद भी चीन ने पीएलए में नेपाली गोरखाओं की भर्ती के लिए नेपाल से अनुरोध किया था. जिसे तब नेपाल ने ठुकरा दिया था भारतीय आर्मी में क्यों आना चाहते हैं नेपाली युवा नेपाली युवा भारतीय सेना में इसलिए आना चाहते हैं क्योंकि इन्हें नेपाल सेना से करीब ढ़ाई गुना ज्यादा सैलेरी मिलती है. इसके अलावा वो उन्हें ज्यादा पेंशन, आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा भी प्रदान करती है. इसके अलावा भारतीय सेना में नौकरी करने वाले नेपाली नागरिकों को भारत में बसने का विकल्प भी देता है. ऐसे में अगर नेपाल सरकार भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं को भर्ती होने की परमिशन नहीं देता है तो चीन स्थिति का फायदा उठाने से नहीं हिचकेगा. गोरखा सैनिकों ने 1947-48, 1965, और 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में अपनी ताकत साबित की. साल 1962 में हुए भारत-चीन के साथ युद्ध में भी गोरखाओं ने चीन को तगड़ी टक्कर थी

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