: बांके बिहारी लाल:-- मंदिर में तैनात सुरक्षाकर्मियों ने श्रद्धालुओं को जमकर पीटा
Sat, Dec 24, 2022
24 दिसंबर मथुरा जनपद के धर्मस्थल वृंदावन के ठाकुर बांके बिहारी मंदिर की व्यवस्थाओं को संभालने के लिए तैनात निजी सुरक्षाकर्मी और भगवान के दर्शन करने आए दो श्रद्धालुओं के बीच जमकर लात घुसा की मारपीट हुई मारपीट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है दरअसल इस घटना को किसी श्रद्धालु ने ही अपने मोबाइल से वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया जिसमें श्रद्धालुओं और तैनात सुरक्षाकर्मियों के बीच कहासुनी के बाद मारपीट हो रही हैदूसर अच्छा कर्मी मंदिर परिसर में फोटो क्लिक कर रहे थे जबकि श्रद्धालुओं की भीड़ को काबू करने में जुटे एक सुरक्षाकर्मी ने उन्हें ऐसा करने से रोका इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में कहासुनी हुई फिर मारपीट शुरू हो गई अब पुलिस इस मामले की जांच कर रही है यह पहला मौका नहीं है जब इस टाइप की अव्यवस्थाओं और अभद्रता ओं को लेकर श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हुई हूं इससे पहले भी मंदिर प्रशासन एवं जिला प्रशासन पर लापरवाही के आरोप लगते रहे हैं बहुत दिन पुरानी बात नहीं है जब इसी वर्ष अगस्त माह में श्री कृष्ण जन्म उत्सव के दौरान हुई भगदड़ में दम घुटने के कारण श्रद्धालु की मौत तक हो गई थी इस टाइप के दर्दनाक वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब देखी गई दर्शन ठाकुर बांके बिहारी लाल के
दर्शन की भारी भीड़ होती है जबकि मंदिर का गर्भ ग्रह परिसर का भी छोटा तथा जाने का रास्ता भी संकीर्ण है जिससे कि आए दिन भक्तों को परेशानी का सामना करना पड़ता है इस बात को लेकर प्रशासन ने चिंताएं तो कई बार जाहिर की है लेकिन कोई ठोस और पुख्ता व्यवस्था आज तक नहीं बन पाई उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को इन सब मुद्दों को लेकर गहनता से अध्ययन करना होगा एवं जिम्मेदारों के हाथों में व्यवस्थाएं सोपनी होंगी इससे पहले कोई बड़ा हादसा हो जिम्मेदारों को अपनी भूमिका निभानी होगी तभी इस प्रकार की घटनाएं रुक सकती हैंआपको बताते चलें कि मंदिर की सुरक्षा के लिए तैनात सुरक्षाकर्मियों के व्यवहार से श्रद्धालु आए दिन आहत होते रहते हैं सुरक्षाकर्मियों की श्रद्धालुओं के साथ आए दिन होने वाली बदसलूकी से वहां के मंत्र प्रशासन जानते हुए भी अनजान बना रहता है उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करता है
: हनुमानजी के पांच सगे भाई भी थे, जानिए उनके नाम ?*
Wed, Dec 21, 2022
*
हनुमानजी के पांच सगे भाई भी थे, जानिए उनके नाम ?
*
हनुमानजी हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता होने की बात कही जाती है, दरअसल वह 33 करोड़ नहीं वरन् 33 कोटि देवी-देवता हैं। यानि कि उन्हीं देवी-देवताओं के विभिन्न रूप एवं अवतार हैं। अब स्वयं देव हों या उनके कोई मानव रूपी अवतार, सभी से जुड़े तथ्य एवं पौराणिक वर्णन काफी दिलचस्प हैं।
रोचक जानकारी आज हम हनुमान जी के बारे में आपको कुछ रोचक जानकारी देंगे। बजरंगबली, पवन पुत्र, अंजनी पुत्र, राम भक्त, ऐसे ही कई नामों से पुकारा जाता है हनुमान जी को। यह बात शायद सभी जानते हैं लेकिन आगे बताए जा रहे कुछ तथ्य हर कोई नहीं जानता।
भगवान शिव का अवतार सबसे पहली बात, हनुमान जी को भगवान शिव का ही अवतार माना जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार अंजना नाम की एक अप्सरा को एक ऋषि द्वारा यह श्राप दिया गया कि जब भी वह प्रेम बंधन में पड़ेगी, उसका चेहरा एक वानर की भांति हो जाएगा। लेकिन इस श्राप से मुक्त होने के लिए भगवान ब्रह्मा ने अंजना की मदद की।
अंजनी पुत्र उनकी मदद से अंजना ने धरती पर स्त्री रूप में जन्म लिया, यहां उसे वानरों के राजा केसरी से प्रेम हुआ। विवाह पश्चात श्राप से मुक्ति के लिए अंजना ने भगवान शिव की तपस्या आरंभ कर दी। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। अंजना ने भगवान शिव को कहा कि साधु के श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्हें शिव के अवतार को जन्म देना है, इसलिए शिव बालक के रूप में उनकी कोख से जन्म लें।
शिव आराधना ‘तथास्तु’ कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गए, इस घटना के बाद एक दिन अंजना शिव की आराधना कर रही थीं और इसी दौरान किसी दूसरे कोने में महाराज दशरथ, अपनी तीन रानियों के साथ पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे।
अंजना के हाथ में गिरा प्रसाद अग्नि देव ने उन्हें दैवीय ‘पायस’ दिया जिसे तीनों रानियों को खिलाना था लेकिन इस दौरान एक चमत्कारिक घटना हुई, एक पक्षी उस पायस की कटोरी में थोड़ा सा पायस अपने पंजों में फंसाकर ले गया और तपस्या में लीन अंजना के हाथ में गिरा दिया।
शिव का प्रसाद अंजना ने शिव का प्रसाद समझकर उसे ग्रहण कर लिया और कुछ ही समय बाद उन्होंने वानर मुख वाले एक बालक को जन्म दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस बालक का नाम मारूति था, जिसे बाद में ‘हनुमान’ के नाम से जाना गया।
अन्य कथा हनुमान जी से जुड़ा एक और तथ्य काफी रोचक है। एक कथा के अनुसार एक बार हनुमान जी ने श्रीराम की याद में अपने पूरे शरीर पर सिंदूर भी लगाया था। यह इसलिए क्योंकि एक बार उन्होंने माता सीता को सिंदूर लगाते हुए देख लिया। जब उन्होंने सिंदूर लगाने का कारण पूछा तो सीता जी ने बताया कि यह उनका श्रीराम के प्रति प्रेम एवं सम्मान का प्रतीक है।
लाल हनुमान बस यह जानने की देरी ही थी कि हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया, यह दर्शाने के लिए कि वे भी श्रीराम से अति प्रेम करते हैं। इस घटना के बाद हनुमान का ‘लाल हनुमान’ रूप भी काफी प्रचलित हुआ।
हनुमान शब्द का संस्कृत अर्थ हनुमान जी से जुड़े कुछ छोटे-छोटे तथ्य हैं, जो काफी कम लोग जानते हैं। जैसे कि उनका नाम, ‘हनुमान’ शब्द का यदि संस्कृत अर्थ निकाला जाए तो इसका मतलब होता है जिसका मुख या जबड़ा बिगड़ा हुआ हो।
ब्रह्मचारी हनुमान इसके अलावा जिन हनुमान जी को ब्रह्मचारी कहा जाता है, उनकी शादी भी हुई थी। उनके पुत्र का नाम मकरध्वज है। लेकिन इसके अलावा उनके पांच भाई भी थे, क्या आप जानते हैं?
हनुमान जी के पांच सगे भाई जी हां... हनुमान जी के पांच सगे भाई थे और वो पांचों ही विवाहित थे। यह कोई कहानी या मात्र मनोरंजन का साधन बनाने के लिए हवा में बताई गई बात नहीं है, बल्कि सच्चाई है। हनुमान जी के पांच सगे भाई थे, इस बात का उल्लेख 'ब्रह्मांडपुराण' में मिलता है।
ब्रह्मांडपुराण के अनुसार इस पुराण में भगवान हनुमान के पिता केसरी एवं उनके वंश का वर्णन शामिल है। बड़ी बात यह है कि पांचों भाइयों में बजरंगबली सबसे बड़े थे। यानी हनुमानजी को शामिल करने पर वानर राज केसरी के 6 पुत्र थे।
सबसे बड़े थे बजरंगबली बजरंगबली के बाद क्रमशः मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान, धृतिमान थे। इन सभी के संतान भी थीं, जिससे इनका वंश वर्षों तक चला। हनुमानजी के बारे जानकारी वैसे तो रामायण, श्रीरामचरितमानस, महाभारत और भी कई हिंदू धर्म ग्रंथों में मिलती है।
लेकिन उनके बारे में कुछ ऐसी भी बातें हैं जो बहुत कम धर्म ग्रंथों में उपलब्ध है। 'ब्रह्मांडपुराण' उन्हीं में से एक है। पिता केसरी का वंशज इस महान ग्रंथ में हनुमान जी के जीवन एवं उनसे जुड़ी कई बातें हैं। इसी ग्रंथ में उल्लेख है कि बजरंगबली के पिता केसरी ने अंजना से विवाह किया था।। सौजन्य से..... आचार्य नारायण दीक्षित नैमिषारण्य सीतापुर 9519922048
: सिख धर्म के दसवें गुरु ,गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की
Sun, Dec 18, 2022
सिख धर्म के नानकशाही कैलेंडर के अनुसार गुरु गोविंद सिंह जयंती प्रकाश पर्व के रूप में जनवरी और दिसंबर के महीने में मनाई जाती है मुगलों के अत्याचारों से बचाने के लिए श्री गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी गुरु गोविंद सिंह सिख धर्म के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर सिंह के सुपुत्र थे उनका जन्म पटना में हुआ था उस समय श्री गुरु तेग बहादुर सिंह जी असम में थे जब वह वहां से वापस लौट कर आए तो गुरु गोविंद सिंह जी 4 साल के हो चुके थे कहा जाता है कि जब श्री गुरु तेग बहादुर डी असम की यात्रा पर थे उससे पहले ही होने वाले बच्चे का नाम गोविंद राय रख दिया गया था जिसके कारण उन्हें बचपन में गोविंद राय कहा जाता था गुरु गोविंद राय बचपन से ही अपनी उम्र के बच्चों से बिल्कुल अलग थे जब उनके साथी खिलौने से खेलते थे और गुरु गोविंद सिंह तलवार कटार धनुष से खेलते थे पटना साहिब में ही गुरु गोविंद सिंह ने संस्कृत गुरुमुखी बृज अवधि अरबी और फारसी की शिक्षा प्राप्त की थी इस समय भी पटना साहिब के गुरुद्वारे को बोनी साहेब के नाम से जाना जाता है वहां पर गुरु गोविंद सिंह की खड़ा हूं कटार कपड़े और छोटा सा धनुष बाण रखा हुआ है जब गुरु गोव जी छोटे थे उनके बचपन में ही गुरु तेग बहादुर जी ने उनकी शिक्षा के लिए आनंदपुर में समुचित व्यवस्था की थी जिसके कारण वह थोड़े समय में कई भाषाओं के महारथी हो गए थे संवत 1731 जब मुगल शासक औरंगजेब के अत्याचार बढ़ते चले जा रहे थे वह कश्मीरी पंडितों पर हो रहे अत्याचार के कारण बहुत चिंतित थे कश्मीरी पंडितों का एक दल गुरु तेग बहादुर जी से मिला और अपनी ऊपर हो रहे जुल्म की कहानी बताइए तब सिख धर्म के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने उनको अपनी शरण प्रदान की कश्मीरी हिंदुओं की बात सुनकर गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने कहा कि हमारे हिंदू धर्म की रक्षा के लिए किसी महापुरुष की आवश्यकता है इस बात को सुनकर बालक गोविंद राय ने अपने पिता से कहा कि इस संसार में आप से बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है जब गुरु गोविंद सिंह ने यह बात कही उस समय उनकी उम्र महज 9 वर्ष की थी इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं जब किसी बालक ने अपने पिता को ही धर्म की रक्षा के लिए वरदान होने की प्रेरणा दी हो गुरु तेग बहादुर सिंह जी के शरीर छोड़ने के पश्चात 1733 को गोविंदराव जी गद्दी पर बैठे तब तक काफी लोग उन्हें चमत्कारी पुरुष मानते थेगुरु गोविंद सिंह सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु के रूप में प्रसिद्ध हुए उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में गुरु ग्रंथ साहब को मान्यता दी और सिखों के लिए गुरु ग्रंथ साहिब का ही निर्देश अंतिम निर्देश होने की बात रखीसिख धर्म के 10 में गुरु ग्रुप में प्रसिद्ध गुरु गोविंद सिंह बचपन से ही बहुत ज्ञानी साहसी वीर दया धर्म की प्रतिमूर्ति थे खालसा पंथ की स्थापना कर गुरु गोविंद सिंह ने सिख धर्म के लोगों को धर्म रक्षा के लिए हथियार उठाने को प्रेरित किया पूरी उम्र दुनिया को समर्पित करने वाले श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने त्याग और बलिदान का जो उदाहरण देश और दुनिया को बताया अद्वितीय है उनकी कहानी को जानकर आप का शीष भी उनके चरणों में झुक जाएगापंत धर्म के संस्थापक गुरु गोविंद सिंह जी जन्मजात योद्धा थे लेकिन वह कभी भी अपनी सत्ता को बढ़ाने या किसी राज्य पर काबिज होने के लिए नहीं लड़े उन्हें राजाओं के अन्याय और अत्याचार से गोल पीड़ा होती थी आम जनता या वर्ग विशेष पर अत्याचार होते देख वह किसी से भी राजा से लोहा लेने को तैयार हो जाते थे चाहे वह शासक मुगल हो या हिंदू यही वजह रही कि गुरु गोविंद सिंह जी ने औरंगजेब के अलावा गढ़वाल नरेश शिवालिक क्षेत्र के कई राजाओं के साथ तमाम युद्ध किया गुरु गोविंद सिंह जी की वीरता को यूं बयां करती है यह पंक्तियां
सवा लाख से एक लड़ाऊं चिड़ियों से मैं बाज लड़ऊं तवे गोविंद सिंह नाम कहाउl
श्री गुरु गोविंद सिंह द्वारा बनाया गया खालसा पंथ आज भी सिख धर्म का प्रमुख पंथ है जिस से जुड़ने वाले जवान लड़के को अनिवार्य रूप से केस गंगा कक्षा कड़ा और कृपाण धारण करनी पड़ती है खालसा पंथ के लोग वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी का फतेह नारा बोल कर आज भी वाहेगुरु के लिए सब कुछ निछावर करने को तत्पर रहते हैं गुरु गोविंद सिंह को युद्ध कला के साथ-साथ संगीत और वह एक महान कवि भी थे जब शब्द कीर्तन गाते थे काव्य रचना के माध्यम से 10वी का मन मोह लेते थे उनकी कई बात यंत्रों में इतनी गहरी रुचि थी कि उन्होंने अपने लिए खास तौर पर कुछ नए और अनोखे बाद यंत्रों का आविष्कार कर डाला गुरु गोविंद सिंह द्वारा बनाई गई क्या और दिलरुबा वाद्ययंत्र आज भी संगीत के क्षेत्र में जाने जाते हैं भौतिक सुख-सुविधाओं से दूर रहने का संदेश देने वाले गुरु गोविंद सिंह जी को युद्ध कला में निपुणता हासिल थी उन्होंने धर्म की रक्षा की खातिर और राष्ट्र की भलाई के लिए सर्वस्व निछावर कर दिया था अपने पिता मां और अपने चारों बेटों को उन्होंने खालसा के नाम पर कुर्बान कर दिया गुरु ग्रंथ साहिब शिक्षकों का यह सबसे पवित्र ग्रंथ है गुरु गोविंद सिंह ने 7 अक्टूबर 1708 में महाराष्ट्र के नांदेड़ में अपना शरीर छोड़ा था आज भी हम गुरु गोविंद सिंह जी को राष्ट्र और मानव की भलाई के लिए उनके दिए गए बलिदान के लिए उनके त्याग के लिए याद करके उनको श्रद्धांजलि देते हैं वह एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिनमें ना केवल युद्ध कला की प्रवीणता हासिल थी बल्कि महान बलिदानी भाषा के जानकार संगीत शिक्षा में निपुण और सरल हृदय थे ऐसे महान व्यक्तित्व को याद करके हमारा हृदय उनके प्रति श्रद्धा दिए गए बलिदान से भर आता है आने वाली प्रकाश पर्व पर उनकी जयंती के उपलक्ष में हमें अपने बच्चों को अपने परिवार के प्रति के सदस्यों को उनके बलिदान और त्याग के विषय में बतलाना चाहिए